आज यानि 11 जुलाई से सावन का महीना शुरू होने जा रहा है. इसी दिन से कांवड़ यात्रा की शुरुआत होती है. कांवड़ यात्रा भगवान भोलेनाथ को समर्पित है. सावन के महीने की कांवड़ यात्रा में शिवभक्त अपनी अपनी श्रद्धानुसार कांवड़ उठाते हैं. माना जाता है कि सावन में जो भी शिवभक्त सावन कांवड़ यात्रा करता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. आज हम आपको कांवड़ यात्रा से जुड़ी हर एक छोटी बड़ी जानकारी देते हैं.
कांवड़ यात्रा को सीधे तौर पर भगवान शिव से जोड़ा जाता है. बताया जाता है भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए ये यात्रा की जाती है. कांवड़ यात्रा श्रद्धा के साथ ही सहनशक्ति और सामूहिक एकता की यात्रा है. कांवड़ यात्रा से अंतर्मन शुद्ध होता है. कांवड़ शिक भक्ति की यात्रा है. कांवड़ यात्रा के दौरान मांस मदिरा का सेवन नहीं किया जाता है. इस दौरान तामसिक भोजन भी वर्जित होता है. कांवड़ यात्रा शरीर के साथ साथ मन की भी यात्रा होती है. कांवड़ यात्रा में 10 दिन बेहद ही अनुशासन से भरे होते हैं. इन्ही दिनों को अपने जीवन में उतारने की सीख भी कांवड़ यात्रा से मिलती है.
हिंदू मान्यताओं के अनुसार कांवड़ यात्रा सनातन से जुड़ी पुरानी और ऐतिहासिक यात्रा है. रामायण में उल्लेख मिलता है श्रवण कुमार ने माता पिता को कंधों पर बिठाकर कांवड़ यात्रा पूरी की थी. उन्होंने इस यात्रा के जरिये अपने माता पिता को चारों धाम के दर्शन करवाये थे. इसी दौरान वे अपने माता पिता को हरिद्वार भी लेकर आये थे. जहां उन्होंने माता पिता को गंगा में स्नान करवाया था. श्रवण कुमार की यात्रा से ही कांवड़ यात्रा का चलन शुरू होना माना जाता है. शुरुआत में ये चारधाम से जुड़ी थी. बाद में कांवड़ यात्रा सावन और शिव भक्ति से जुड़ गई. बताया जाता है कि इसकी शुरूआत परशुराम ने की थी. बताया जाता है कि परशुराम ने यूपी बागपत के मंदिर का कांवड़ के जल से जलाभिषेक किया था.
इसके बाद भगवान श्रीराम को भी कांवड़ यात्रा से जोड़कर देखा जाता है. कहा जाता है कि परशुराम के बाद भगवान श्रीराम ने भी कांवड़ के जल से शिव का जलाभिषेक किया था. इसी के साथ मान्यताओं मे भी रावण के भी कांवड़ यात्रा का उल्लेख मिलता है. बताया जाता है कि रावण ने भी शिव का कांवड़ के जल से जलाभिषेक किया था.